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बाल श्रम

नन्हे नन्हे कंधो पे बाल श्रम का तसला। सूखी सुखी आँखे उत्पीड़न का थैला। कच्ची कच्ची राहे जग इनका सहमा। ना माँ की लोरी ना पिता प्रेम सुनहरा। चूल्हा चक्की मे पीस सखि सहेली स्कूल छूटा। सुलगी गुड्डी -गुडिया मेरा बचपन रोज जला। लेखक :आनंद कुमार यादव