यह शराफत अपने पास रखो
इतने भी भले नहीं हो यह शराफत अपने पास रखो क्यों गर्मी है तुममे अपनी तबियत अपने पास रखो चुप रहने की वजह न खोजो अपनी जुबान अपने पास रखो किस तरह की दोस्ती है यह मेरी पीठ का खंजर अपने पास रखो चोट तुम्हे भी लग सकती है अपना चाटा अपने पास रखो पत्थर उठाने की सोचना भी नहीं मरने मारने का इरादा अपने पास रखो आग ना लगाना समझे तुम यह जलने- जलाने का हुनर अपने पास रखो ..... आनन्द कुमार यादव